हमें अपनी आत्मा को शक्तिशाली करने की क्या ज़रूरत है?

 

संत राजिन्दर सिंह जी महाराज

 

हमारे भीतर, आत्मा का सच्चा स्वरूप है दिव्य प्रेम, सदा-सदा रहने वाली शांति, विवेक, निडरता, चेतनता, कभी न ख़त्म होने वाला परमानंद, और अनंत जीवन। इस आध्यात्मिक दौलत को पाने के बजाय, हमने अपने मन को इतना शक्तिशाली बना दिया है कि वो इन गुप्त ख़ज़ानों को हमसे छुपाए रखता है। हम इन ख़ज़ानों से अनजान हैं क्योंकि हमारी आत्मा के ऊपर मन, इंद्रियों, और भौतिक शरीर के आवरण हावी हो चुके हैं। हमारी आत्मा मन, माया, और भ्रम की दुनिया में खो चुकी है। वो अपने आप को शरीर और मन ही समझने लगी है और अपने सच्चे स्वरूप को भूल चुकी है। इसीलिए, मन और शरीर हमारी आत्मा के ऊपर अपनी ताकत जमाए बैठे हैं। अपने सच्चे रूवरूप का अनुभव करने के लिए हमें अपनी आत्मा को शक्तिशाली करना होगा, ताकि वो हमारे जीवन को समृद्ध बना सके। आत्मा को शक्तिशाली करने का अर्थ है कि हम मन और इंद्रियों को दी हुई ताकत को वापस ले लें, ताकि इनके बजाय हमारी आत्मा हमारे जीवन को नियंत्रित और निर्देशित कर सके। जब हम अपनी आत्मा को शक्तिशाली कर लेते हैं, तो हम पाते हैं कि हम इतने अधिक प्रेम से भर गए हैं जितना हमने कभी भी इस भौतिक संसार में अनुभव नहीं किया होता है; हम अपने सच्चे स्वरूप और प्रभु के प्रति अधिक चेतन हो जाते हैं; तथा अनंत ख़ुशियों और आनंद से भरपूर हो जाते हैं।

अतिरिक्त संदेश

प्रभु-प्रेम का महासागर

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जब हम प्रभु के शुद्ध़, शीशे की तरह साफ़, महासागर में तैरते हैं, तो हम अपने सच्चे अस्तित्व या आत्मा का प्रतिबिंब देख पाते हैं। उसे धुंधला करने के लिए कोई मिट्टी या गंदगी नहीं होती है। हम महासागर की गहराई में देख पाते हैं, और कोई भी चीज़ हमारे ध्यान को उस पानी की शांति की ओर से नहीं हटा पाती।

दोनों दुनियाओं का आनंद लेना

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हम दोनों दुनियाओं का आनंद ले सकते हैं। हम आध्यात्मिक तरक्की करने के साथ-साथ अपने परिवार, समाज, और पूरे विश्व के प्रति सकारात्मक योगदान भी दे सकते हैं।

मदर्स डे

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मदर्स डे के अवसर पर आइए हम प्रभु और अपनी माँ का सम्मान करें कि वे हमें इस दुनिया में लेकर आए, तथा हमें प्यार दिया व हमारी देखभाल की। हमें केवल मई के दूसरे रविवार को ही नहीं, बल्कि अपने जीवन के प्रत्येक दिन यह कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए।