ध्यानाभ्यास के द्वारा प्रभु की नज़दीकी पाना

सितम्बर 20, 2024

28वें विश्व आध्यात्मिक सम्मेलन (13-20 सितम्बर 2024) के समापन सत्र में भाग लेने के लिए भारत के कई भागों और दुनिया के अनेक देशों से कई हज़ार श्रद्धालुगण संत दर्शन सिंह जी धाम, बुराड़ी, में एकत्रित हुए। इस दिन अंतर्राष्ट्रीय ध्यानाभ्यास दिवस तथा संत राजिन्दर सिंह जी महाराज का पावन प्रकाशोत्सव भी था।

अपने संदेश में महाराज जी ने बताया कि हम कैसे अध्यात्म और प्रेम को अपने जीवन में ढालकर इस मानव चोले के उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं। इंसान होने के नाते, महाराज जी ने फ़र्माया, हम बाहरी क्षणिक चीज़ों में ही आनंद और शांति ढूंढते रहते हैं। लेकिन, जो लोग प्रभु की तलाश करते हैं, वो ऐसी रौशनी की तलाश करते हैं जो हमेशा-हमेशा के लिए हमारे साथ रहती है, तथा सदा-सदा के आनंद व शांति की तलाश करते हैं। ये स्थाई ख़ुशियाँ हमें दुख, तनाव, और कलह से भरपूर बाहरी संसार में कभी नहीं मिल सकतीं, महाराज जी ने फ़र्माया। स्थाई शांति और आनंद हमारे भीतर ही है, और हम ध्यानाभ्यास के द्वारा इसका अनुभव कर सकते हैं। प्रभु, शांति और प्रेम के महासागर हैं, महाराज जी ने फ़र्माया, जिनमें थोड़ी सी भी हलचल नहीं है। इस महासागर में लीन होने के लिए, हमें अपने अंतर में जाना होगा। “अगर हम अंतर में नहीं जायेंगे, तो हम कुछ नहीं पायेंगे,” महाराज जी ने सबको याद दिलाया, तथा समझाया कि प्रभु के प्रेम रूपी महासागर में लीन होने के लिए हमें प्रेम के मार्ग पर चलना होगा, क्योंकि जो प्रेम करते हैं, केवल वही प्रभु को पाते हैं।

हमारी ज़िंदगी का एक निश्चित उद्देश्य है, और वो उद्देश्य है प्रभु को खोजना, प्रभु से मिलना, और प्रभु में लीन होना। इसके लिए, हमें अपने ध्यान को बाहरी संसार की हलचल से हटाना है और उसे अपने अंतर में एकाग्र करना है। ध्यानाभ्यास के द्वारा अपनी सुरत की धारा को अपने शिवनेत्र, या तीसरी आँख, पर एकाग्र करने से, हम प्रभु की दिव्य सत्ता के साथ जुड़ सकते हैं। अब ये हम पर निर्भर करता है कि हम संतों की शिक्षा अनुसार सही तरीके से जीवन जियें, संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया। अगर हम ऐसा करेंगे, तो हम हर दिन सुबह जागने पर अपना सच्चा “जन्मदिन” मना सकेंगे, जो हमें प्रभु के और अधिक नज़दीक ले जाए।