इस खेल में प्रेम ही सर्वोपरि है

मई 8, 2022

यह इंसानी जन्म एक बहुत बड़ी बरकत है। यह हमें प्रभु द्वारा दिया गया है, ताकि हम प्रभु के पास वापस पहुँच सकें। हमारी आत्मा युगों-युगों से प्रभु से बिछुड़ी हुई है और अपने स्रोत में वापस लीन होने के लिए तड़प रही है। इंसान होने के नाते हम सबको वो सभी पदार्थ दिए गए हैं जो प्रभु के पास वापस जाने के लिए हमें चाहियें।

इंसानी जीवन की देन के बारे में आगे बताते हुए संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने समझाया कि हमारा जीवन एक रेस या दौड़ की तरह है, जिसे हम में से हरेक ने पूरा करना है। इस रेस को हम तब पूरा करते हैं जब हम प्रभु के पास वापस पहुँच जाते हैं। लेकिन इस रेस में हमारा जीतना, या प्रथम, द्वितीय, या तृतीय आना, ज़रूरी नहीं है। इसके विपरीत, यह एक ऐसी रेस है जिसे पूरा करने में और लक्ष्य तक पहुँचने में हमें एक-दूसरे की मदद करनी है। ऐसा हम प्रेम के द्वारा ही कर सकते हैं, और प्रेम के द्वारा ही हम इस यात्रा पर तरक्की कर प्रभु के साथ एकमेक हो सकते हैं। इसीलिए, इस खेल में प्रेम ही सर्वोपरि है।

हम अपने साथी इंसानों के लिए प्रेम का विकास कैसे कर सकते हैं? इसकी शुरुआत तब होती है, महाराज जी ने फ़र्माया, जब हम ध्यानाभ्यास के द्वारा प्रभु के प्रेम का अनुभव कर लेते हैं। जब हम दिव्य प्रेम में नहा जाते हैं, तो हम उस प्रेम के मूर्त रूप बन जाते हैं, और फिर वो प्रेम हमारी किसी कोशिश के बिना भी हमसे होकर दूसरों तक फैलता रहता है। जब हम प्रभु के धाम की ओर बढ़ते जायेंगे, और प्रभु-प्रेम की खुश्बू फैलाते रहेंगे, तो धरती पर स्वर्ग उतर आएगा। यही संतों-महापुरुषों का स्वप्न है, और यही स्वप्न हमें अपने सच्चे घर वापस ले जाएगा।