हर साँस के साथ प्रभु का शुक्राना करें
त्यौहारों के इस मौसम में संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने उस सबसे बड़े उपहार की बात की जो हमें दिया गया है। वो उपहार है इस मानव चोले का, जो हमें सबसे बड़े दाता, प्रभु, ने बख़्शा है। हमारी आत्मा को प्रभु का धाम छोड़े अनेकों युग बीत चुके हैं, और तभी से वो इस विशाल सृष्टि में असहाय भटक रही है, तथा अपने सच्चे घर वापस जाने के लिए तड़प रही है। प्रभु ने असीम कृपा कर हमें इस मानव चोले का उपहार दिया है – केवल इसी चोले में हमारी आत्मा रूपी बूँद आज़ाद होकर प्रभु रूपी महासागर में समा सकती है।
इसके बाद प्रभु ने हमें एक दूसरा उपहार भी दिया है – तड़प का उपहार, जो हमें एक पूर्ण सत्गुरु के चरणों में ले आती है, जो प्रेम के पथ पर हमारा मार्गदर्शन कर हमें प्रभु के पास वापस पहुँचा देते हैं। प्रेम के मार्ग पर चलने से हमारी आत्मा को सबकुछ मिल जाता है। जिस तरह सड़क पर भटक रहे किसी पशु के बच्चे को घर लाने वाले इंसान के प्रति वो पशु का बच्चा बेहद प्रेम और समर्पण-भाव रखता है, उसी तरह हमें भी प्रभु की असीम कृपा के लिए प्रभु का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हम ऐसा कैसे कर सकते हैं? ध्यानाभ्यास के द्वारा, संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया।
ध्यानाभ्यास वो प्रयोग है जो हम अपने शरीर के भीतर करते हैं, और जो हमें ख़ुद प्रभु के प्रेम व प्रकाश का अनुभव करने का अवसर देता है। तब, यह अवधारणा कि हमारी आत्मा प्रभु से जुड़ी हुई है केवल अवधारणा ही नहीं रह जाती है। वो हमारी सच्चाई बन जाती है, और हमारे अंदर प्रभु के लिए विश्वास के रूप में उत्पन्न होती है। जितना अधिक हम ध्यानाभ्यास करते हैं, उतना ही अधिक हम प्रभु का अनुभव करते हैं, और उतना ही अधिक प्रभु में हमारा विश्वास बढ़ता जाता है। प्रभु से मिलने वाले प्रेम को हम प्रतिबिम्बित करते हैं और प्रभु से प्रेम करने लगते हैं, और फिर यह प्रेम बढ़कर भक्ति में बदल जाता है। प्रभु के लिए प्रेम, विश्वास, और भक्ति ही हमें उस मार्ग पर तरक्की कराती है जो हमें हमारे सच्चे घर वापस ले जाता है।