प्रयासरहित प्रयास की कला
संत-महापुरुष हमें सिखाते हैं कि ध्यानाभ्यास, एकाग्रता की विधि है, जिसमें हम अपना ध्यान बाहरी संसार के आकर्षणों से हटाकर अपने भीतर की स्थिरता पर केंद्रित करते हैं। लेकिन, नौसिखिए लोग अक्सर सोचते हैं कि यह एकाग्रता जबरन करनी पड़ती है। इसके विपरीत, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने फ़र्माया, अध्यात्म का अनुभव शांत व आरामदायी अवस्था में किया जाता है।
जब हम ध्यान टिकाते हैं, तो हमें आरामदायक अवस्था में प्रयासरहित प्रयास करने की कला का अभ्यास करना चाहिए। हमारा काम है आराम से आँखें बंद कर, अपने अंतर में आठ से दस इंच दूरी पर ध्यान एकाग्र करना। इसके बाद हमें बस धैर्य और प्रेम के साथ प्रतीक्षा करनी है। हमारे विचार और अन्य व्यवधान हमें प्रभु-प्रेम का अनुभव करने के लिए ज़रूरी स्थिरता पाने से रोकते हैं। अब यह हम पर है कि हम ध्यान केंद्रित रखें, और मन की चालों को खुद को भटकाने न दें। यह क्षेत्र है जहाँ हमें अपना प्रयास देना होता है।
ध्यानाभ्यास करने के लिए हमें शांत और स्थिर होना चाहिए, तनाव और हलचल से रहित। हमें प्रभु की रज़ा के प्रति समर्पित होना चाहिए और एक खाली प्याले की तरह बैठना चाहिए, किसी भी तरह की अपेक्षा से बिल्कुल मुक्त, प्रभु के प्रेम व प्रकाश को ग्रहण करने के लिए तैयार। जब हम अपने अभ्यास में नियमित होते हैं, तो हमारी आध्यात्मिक तरक्की तेज़ी से होती चली जाती है, और हम ध्यानाभ्यास के दौरान होने वाले अनुभवों के लिए आभारी रहते हैं।