आंतरिक आँख से देखना सीखें
इस शाम कृपाल बाग़, दिल्ली, में संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने स्थाई शांति पाने के विषय पर सत्संग फ़र्माया। जब हम अपने आसपास के संसार को देखते हैं, तो हम बाहरी आकारों, रंगों, धर्मों, विश्वासों, और अन्य बाहरी चीज़ों को ही देखते हैं। हमारी शारीरिक आँखों से देखने पर ये फ़र्क हमें अलग कर देते हैं, तथा आपसी विवाद और हलचल का कारण बनते हैं। शांति पाने के लिए हमें संसार को एक अलग नज़रिए से देखना सीखना होगा।
नज़रिए में ये बदलाव तब आता है जब हम आध्यात्मिक दृष्टि हासिल कर लेते हैं, जिससे हमार अंदर ये क्षमता आ जाती है कि हम बाहरी फ़र्कों से ऊपर उठकर प्रभु की बनाई सम्पूर्ण सृष्टि की एकता को देख सकें। आध्यात्मिक दृष्टि से देखने पर हम दूसरों को भी अपना ही अंग समझने लगते हैं। जब ऐसा होता है, तो हम अपनी बातचीत और व्यवहार में अधिक प्रेम, सम्मान, और सौहार्द से भरपूर हो जाते हैं, जिससे हमारे जीवन में अधिक शांति आ जाती है।
हम वो आध्यात्मिक दृष्टि कैसे पा सकते हैं जिससे हमें स्थाई शांति मिल सकती है? हमें वो तब मिलती है जब एक पूर्ण सत्गुरु की मदद व मार्गदर्शन से, हमारी आंतरिक आँख खुल जाती है, और हम ध्यानाभ्यास के द्वारा अंदरूनी आध्यात्मिक यात्रा पर जा पाते हैं। तब हम प्रभु की ज्योति को सभी जीवों में जगमगाता हुआ देखने लगते हैं। तब हम प्रभु की बनाई सम्पूर्ण सृष्टि के साथ अपनी एकता को स्वीकार कर लेते हैं और उसका अनुभव भी करने लगते हैं।
शायर-संत, संत दर्शन सिंह जी महाराज के एक शेअर की व्याख्या करते हुए, संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया कि प्रभु का प्रकाश हर जगह मौजूद है। वो हमारे अंदर है, हमारे बाहर है, और हर प्राणी के अंदर है। ये प्रकृति में हर जगह मौजूद है, हर इंद्रधनुष, हर सूर्योदय, और हर सूर्यास्त में है। सृष्टि का सबसे छोटा कण भी हमें प्रभु की उपस्थिति की ख़ुशखबरी देता है, शेअर में समझाया गया था। प्रभु का प्रकाश इस दुनिया के अंधकार को दूर कर देता है। इस प्रकाश का अनुभव हम तब कर सकते हैं जब हम ध्यानाभ्यास के द्वारा ख़ुद को प्रभु के प्रेम के साथ जोड़ देते हैं।