बी स्पिरिच्युली फ्ऱी इन 2023!

जनवरी 8, 2023

2023 की शुरुआत में संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने नए साल का स्लोगन दिया था: बी स्पिरिच्युली फ्ऱी इन 2023! (2023 में आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र हों!) आज, साल के पहले रविवारीय सत्संग में, महाराज जी ने इस नारे के अर्थ व महत्त्व की व्याख्या की, तथा आने वाले महीनों में इस हासिल करने के लिए एक स्पष्ट ब्लूप्रिन्ट दिया।

हर नया साल एक नई शुरुआत है, और इसमें हम प्रण करते हैं कि हम पिछले साल से बेहतर करेंगे, महाराज जी ने फ़र्माया। क्योंकि हमारा ध्यान इस भौतिक संसार में ही लगा रहता है, इसीलिए हम शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से कुशाग्र, और भावनात्मक रूप से मज़बूत बनने का प्रण लेते हैं, लेकिन हम अपने अस्तित्व का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू भूल जाते हैं – हमारा आध्यात्मिक पहलू। असल में जो चीज़ सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है वो है आध्यात्मिक रूप से तरक्की, और इस साल का नारा हमें अपने जीवन के इस पहलू को प्राथमिकता देने में मदद करेगा।

आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र होने का क्या अर्थ है?अपने मूल रूप में, महाराज जी ने समझाया, हम एक आत्मा हैं, एक चेतन अस्तित्व हैं जो अपने शरीर, अपनी भावनाओं, और अपनी बुद्धि से जकड़े हुए हैं। आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र होने का अर्थ है अपनी आत्मा को इन जकड़नों से आज़ाद करना, ताकि वो आज़ाद होकर प्रभु के साथ एकमेक होने के अपने उद्देश्य को पूरा कर सके, जिस तरह पिंजरे में बंद पक्षी आज़ाद होते ही आकाश में उड़ान भरने लगता है।

हम आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र कैसे हो सकते हैं?सबसे पहले, हमारे अंदर आज़ाद होने की तड़प होनी चाहिए, और हमें इस उद्देश्य के प्रति पूरी तरह से एकाग्र रहना चाहिए, तथा इस संसार की विभिन्न इच्छाओं व ज़रूरतों से भटक नहीं जाना चाहिए। दूसरे, हमें वो तरीका सीखना चाहिए जिससे हम अपनी आत्मा को आज़ाद कर सकें। यह तरीका है ध्यानाभ्यास का, जिसमें हम अपने शरीर व मन को स्थिर करना सीखते हैं, ताकि हम अपना ध्यान आंतरिक रूहानी मंडलों में एकाग्र कर सकें। ध्यानाभ्यास की विधि सीखने के बाद हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम सही ढंग से ध्यान टिकायें। जितना अधिक हम अभ्यास करेंगे, उतना ही अधिक हम अपने मन की शक्ति को प्रभु की ओर केंद्रित करने में माहिर होते जायेंगे। सही तरीके के साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि हमारे अभ्यास में नियमितता हो। हमें रोज़ाना ध्यानाभ्यास करना चाहिए, क्योंकि हर दिन हमारी तरक्की होती चली जाती है।

ध्यानाभ्यास करने के साथ-साथ हमें हर उस चीज़ को भी त्यागना चाहिए जो हमारी आत्मा को इस संसार से बाँधे हुए है। हम सब अपनी इच्छाओं, रिश्तों, और ज़िम्मेदारियों के द्वारा इस बाहरी संसार के साथ बँधे हुए हैं। अगर हम अपनी आत्मा को स्वतंत्र करना चाहते हैं, तो हमें उन गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो हमें प्रभु के नज़दीक ले जायें, क्योंकि यही हमारा परम उद्देश्य है।

आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र होने की हमारी कोशिश में एक और चीज़ जो हमारी मदद करती है, वो है कृतज्ञता से भरपूर जीवन। जब हम अपने जीवन की सभी देनों के लिए प्रभु के प्रति शुक्राना रखते हैं, तो हम शांति और सौहार्द पा लेते हैं। इससे हमें ध्यानाभ्यास के समय चेतनता की गहन अवस्थाओं में पहुँचने में मदद मिलती है। जब हम इन सब चीज़ों को अपने जीवन में ढालते हैं, तो हम देखते हैं कि आध्यात्मिक मार्ग पर हमारी तरक्की तेज़ी से होती चली जाती है, और हम आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र होने के अपने लक्ष्य में सफलता पा लेते हैं।

यह प्रभु का प्रेम है जो हमें यहाँ ले आया है, संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया, तथा हमें इस मानव चोले में प्रभु के प्रेम का अनुभव करने की आवश्यकता है, क्योंकि यही प्रेम हमारी आत्मा को उसके पिंजरे से निकालकर आंतरिक आकाश की विशालता में उड़ान भरवा सकता है।