हम प्रभु को क्या दे सकते हैं?

नवम्बर 20, 2022

आज के अपने सत्संग में, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने उस उपहार के बारे में बताया जो हम प्रभु को दे सकते हैं। प्रभु को हमसे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन एक ऐसा गुण है जो अगर हम धारण करें तो प्रभु को ख़ुशी होती है, महाराज जी ने फ़र्माया। वो गुण है प्रभु के लिए तड़प होना।

प्रभु के लिए तड़प तब पैदा होती है जब हमारे अंदर प्रभु को पाने की सच्ची इच्छा होती है; और यह इच्छा प्रभु के लिए प्रेम से उत्पन्न होती है। तो हम प्रभु से प्रेम करना कैसे सीख सकते हैं? प्रेम हमारी आत्मा के भीतर मौजूद है, महाराज जी ने फ़र्माया। अगर हम अपनी आत्मा का अनुभव कर लेंगे, तो हम इस प्रेम का अनुभव कर लेंगे। जब हम ख़ुद को आत्मा के रूप में जान लेंगे, तो हमारे अंदर अपने आप ही प्रभु के लिए तड़प पैदा हो जाएगी, क्योंकि हम अपने स्रोत, प्रभु, के साथ अपने लंबे बिछोड़े को जान जायेंगे। ख़ुद को आत्मा के रूप में अनुभव करने के लिए हमें अपने ध्यान को बाहरी संसार के आकर्षणों से हटाकर, ध्यानाभ्यास के द्वारा अंतर में एकाग्र करना होगा।

जितना ज़्यादा हम ध्यानाभ्यास के द्वारा प्रभु की ज्योति व श्रुति के साथ जुड़ते जाते हैं, उतना ही अधिक हमारे अंदर प्रभु के लिए प्रेम बढ़ता चला जाता है। यह संपर्क जुड़ने से हम अपने अस्तित्व की सच्चाई को जान जाते हैं। इससे प्रभु व प्रभु की बनाई सृष्टि के साथ हमारा संबंध मज़बूत होता चला जाता है। जब हम अपने अंदर प्रभु के प्रकाश का अनुभव कर लेते हैं, तो हम यह भी जान जाते हैं कि यही प्रकाश दूसरों के अंदर भी चमक रहा है। तब हम अपनी आपसी एकता व संबद्धता को गले लगा लेते हैं। अपने साथी इंसानों के लिए हमारा प्यार बढ़ता जाता है, और हम प्रभु की बनाई समस्त सृष्टि की निस्वार्थ सेवा करने लगते हैं। जब हम रोज़ाना अपने विचारों, वचनों, व कार्यों का निरीक्षण करते हैं, और अपनी कमियों को दूर करते हैं, तो हम प्रभु-प्राप्ति के मार्ग पर तरक्की करते जाते हैं। ध्यानाभ्यास, निस्वार्थ सेवा, और दैनिक आत्म-निरीक्षण से प्रभु के लिए हमारा प्रेम बढ़ता चला जाता है, और इससे प्रभु के लिए हमारी तड़प भी बढ़ती चली जाती है।