35वें अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता सम्मेलन में एकीकरण अपनाने पर ज़ोर
संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने 4 फरवरी को दिल्ली में तीन-दिवसीय 35वें अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस सम्मेलन में विश्व भर से आए हज़ारों श्रद्धालुओं और वक्ताओं ने भाग लिया। इस सम्मेलन में संत कृपाल सिंह जी महाराज (1894-1974) के सार्वभौमिक संदेश को आगे बढ़ाया जाता है, जो मानव एकता, एकीकरण, और आध्यात्मिक जागृति पर केंद्रित था।
संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने याद किया कि कैसे पचास साल पहले ने प्रथम मानव एकता सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। वो सम्मेलन धर्म के नहीं, बल्कि मानवता के आधार पर आयोजित किया गया था, और उसमें सभी का स्वागत था, चाहे वो प्रभु में विश्वास रखते थे या नहीं। उसका लक्ष्य यही था कि समस्त मानवता, सृष्टिकर्ता की संतान होने के नाते अपनी आपसी एकता को पहचान सके।
आत्मा के स्तर पर हम सब एक हैं और परमात्मा का अंश हैं, महाराज जी ने फ़र्माया। इस सच को हम तभी अनुभव कर सकते हैं जब हम ध्यानाभ्यास के द्वारा अंतर में जायें। भौतिक इंद्रियों पर जीने वाले इंसान होने के नाते, हम ख़ुद को हर समय हलचल में पाते हैं। हमारी बाहरी आँखें और कान लगातार बाहरी संसार की जानकारी को हमारे अंदर लाते रहते हैं। जितनी ज़्यादा जानकारी हम अंदर लेते हैं, उतना ही हमें उसको समझना होता है, और उतना ही हमारे अंदर हलचल ज़्यादा होती है, और उतना ही हमारे लिए स्थिर होना कठिन हो जाता है। इसी वजह से, हमें 2024 में ज़्यादा से ज़्यादा ध्यानाभ्यास करना है, ताकि हमारी आत्मा को प्रभु की वो करीबी मिल सके जिसके लिए वो तड़प रही है।
इस सम्मेलन के अंतिम दिन, यानी कि 6 फरवरी को, संत कृपाल सिंह जी महाराज का पावन जन्मोत्सव था। उनके जीवन को याद करते हुए महाराज जी ने फ़र्माया कि संत कृपाल सिंह जी एक माली की तरह प्रभु के बाग़ीचे को संभालने के लिए आए थे, जहाँ कई रंगों के फूल खिलते हैं, और अलग-अलग धर्मों, आस्थाओं, संस्कृतियों, देशों, और भाषाओं के लोग रहते हैं।
संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने सबको प्रेरित किया कि वे प्रेम के मार्ग पर चलें, और जानें कि हम सब आपस में जुड़े हुए हैं। हमें दूसरों का मददगार होना चाहिए और करुणा व निष्काम सेवा का जीवन जीना चाहिए। आइए हम रोज़ाना ध्यानाभ्यास करें, उन्होंने फ़र्माया, ताकि हम इसी जीवन में आत्म-ज्ञान और प्रभु-प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त कर लें।