प्रेम का रसायन

मार्च 20, 2022

इंसान होने के नाते हम खुद को केवल शरीर और मन ही समझते रहते हैं, तथा यह नहीं जानते कि हमारा सच्चा स्वरूप इससे बढ़कर कुछ है। हम खुद को दूसरों से अलग और बेहतर समझते हैं।अहंकार के प्रभाव में रहते हुए हम ऐसा जीवन जीते हैं जो केवल हमारे अपने लिए होता है और जो हमारे अंदर हलचल ले आता है, और हम शांति व स्थिरता पाने में असमर्थ रहते हैं। तो हम एक ऐसी अवस्था तक कैसे पहुँच सकते हैं जहाँ शांति और प्रेम हमारे जीवन का आधार बन जायें?

इसकी शुरुआत तब होती है, महाराज जी ने समझाया, जब हम यह अनुभव कर लेते हैं कि हमारा असली अस्तित्व भौतिक इंद्रियों से परे है। ध्यानाभ्यास के द्वारा हम स्वयं को आत्मा के रूप में, परमात्मा के अंश के रूप में, अनुभव कर लेते हैं। ध्यानाभ्यास में प्रभु की ज्योति व प्रेम के साथ जुड़ने से हम प्रेम के ज़बरदस्त रसायन का अनुभव करने लगते हैं। हम इस सच्चाई को जान जाते हैं कि हम सब एक ही हैं, और इससे हम प्रेमपूर्वक एक-दूसरे की सेवा करने के लिए प्रेरित होते हैं। हम स्वार्थी से निस्वार्थ, हिंसक से अहिंसक, बन जाते हैं, और द्वैत के बजाय एकता का जीवन जीने लगते हैं। । सारी नफ़रत खत्म हो जाती है और हम अपना दिल सबके लिए खोल देते हैं।

जब प्रभु का प्रेम हमारे रोम-रोम में समा जाता है, तो हम इस दिव्य प्रेम के संवाहक बन जाते हैं, और तब हम जहाँ भी जाते हैं प्रभु-प्रेम की खुश्बू को फैलाते हैं। प्रभु का प्रेम हमें बदल देता है, और हम अपना जीवन उस तरह से बिताने लगते हैं जैसा प्रभु चाहते हैं कि हम बितायें। प्रभु ने यह सृष्टि प्रेम के द्वारा उत्पन्न की है, और प्रेम के ही द्वारा हमारे जीवन को अर्थ मिलता है। प्रेम के ही द्वारा हम प्रभु के पास वापस पहुँच सकते हैं।