प्रभु की योजना में विश्वास रखें
युगों-युगों से संत-महापुरुष हमें याद दिलाते आए हैं कि प्रभु कहीं दूर नहीं रहते जहाँ जाने के लिए हमें कठिन यात्राएँ करनी पड़ें। प्रभु तो हमारे भीतर ही निवास करते हैं और हम उन्हें अवश्य पा सकते हैं। तो फिर प्रभु को पाना इतना कठिन क्यों है? आज के अपने सत्संग में, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने समझाया कि जब हमारा ध्यान बाहरी संसार में लगा होता है, तो हम उसके साथ आने वाली मुश्किलों, तकलीफ़ों, कठिनाइयों, और आकर्षणों का भी अनुभव करते रहते हैं।
खुद को कर्ता समझते हुए, और यह मानते हुए कि हमारा जीवन हमारे अपने नियंत्रण में है, हम यह ज़िम्मेदारी ले लेते हैं कि हमारा जीवन हमारी योजना के अनुसार गुज़रे। इससे हमारे जीवन में तनाव और हलचल बढ़ते जाते हैं। ध्यानाभ्यास के द्वारा अंदरूनी यात्रा पर जाने और प्रभु का अनुभव करने के लिए मन का स्थिर होना बहुत ज़रूरी है। इसीलिए, प्रभु का अनुभव करने की इच्छा के बावजूद, हम प्रभु को पाने में असफल रहते हैं।
प्रभु में विश्वास होना बहुत ज़रूरी है। जब हमें प्रभु में विश्वास होता है, तो हमें पता होता है कि प्रभु हमारी देखभाल कर रहे हैं। तब हम खुद को कर्ता नहीं समझते हैं, बल्कि जान जाते हैं कि प्रभु ही असली कर्ता हैं, और तब हम अपने लिए प्रभु की योजना को स्वीकार कर लेते हैं। जब हम प्रभु के भाणे में जीने लगते हैं, तो हम अतीत या भविष्य के बारे में चिंता करना छोड़ देते हैं। हम जीवन के बहाव के साथ चलते जाते हैं और हमारा जीवन आसान बन जाता है, जिसमें तनाव और हलचल कम हो जाते हैं। हमारा ध्यानाभ्यास भी अधिक फलदायी हो जाता है, क्योंकि हम उस स्थिरता को पा लेते हैं जो अंतर्मुख होने और प्रभु के प्रेम व प्रकाश का अनुभव करने के लिए हमें चाहिए। संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया कि जितना अधिक हम ध्यानाभ्यास करते हैं, उतना ही प्रभु में हमारा विश्वास दृढ़ होता जाता है। जब हमें भरोसा होता है कि प्रभु हमें वही देंगे जो हमारे लिए सही होगा, तो हमारी आध्यात्मिक तरक्की तेज़ी से होती चली जाती है ।