खुश रहने के लिए ध्यानाभ्यास करें
इस दोपहर, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने लाइल, इलिनोई के एस.ओ.एस. इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर में अपना रविवारीय सत्संग फ़र्माया। यह शारीरिक रूप से दो सालों में उनका पहला रविवारीय सत्संग था। आज महाराज जी ने खुशी की हमारी शाश्वत तलाश के बारे में बताया और समझाया कि असल में हमें किस चीज़ से सदा-सदा की खुशियाँ मिलती हैं।
अपनी इंद्रियों के स्तर पर जीते हुए हम सोचते हैं कि सबसे पहले तो शारीरिक स्वास्थ्य और सुविधाएँ ही हमें खुशियाँ दे सकती हैं। हम सोचते हैं कि अगर हमारा शरीर दर्द में हो तो हम खुश नहीं रह सकते। दूसरी बात, हमें लगता है कि अगर हमें मानसिक या भावनात्मक दर्द हो रहा हो तो हम खुश नहीं रह सकते। हमारी शारीरिक और मानसिक अवस्थाएँ हमारे असली अस्तित्व का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं, महाराज जी ने समझाया। असल में हमारा आत्मिक स्वास्थ्य ही यह निर्धारित करता है कि हमें सदा-सदा की खुशियाँ मिलेंगी या नहीं। जब हम ध्यानाभ्यास के द्वारा अपनी आत्मा को पोषित करते हैं, तो हम सदा-सदा की खुशियाँ पा सकते हैं, चाहे हमारी शारीरिक और मानसिक अवस्थाएँ कैसी भी हों। जब हम अंतर में प्रभु की ज्योति के साथ जुड़ जाते हैं, तो हम आनंद के महासागर में नहा जाते हैं।
आंतरिक मंडलों के प्रेम व आनंद का अनुभव करने के लिए हमें पहले अपने शरीर व मन को शांत करना होगा, ताकि हम अंतर में ध्यान एकाग्र कर सकें। इसके लिए हमें अपने शरीर और मन को टॉक्सिन्स (विषैले पदार्थों) से मुक्त करना होगा। आज ऐसे कई साधन उपलब्ध हैं जिनका इस्तेमाल कर हम अपने शरीर को ऐसे टॉक्सिन्स से मुक्त कर सकते हैं जो शरीर में रोग पैदा करते हैं। लेकिन हमारे मानसिक टॉक्सिन्स का क्या? जब हम भय, व्यग्रता, क्रोध, और ईर्ष्या जैसे टॉक्सिन्स को अपने अंदर आने देते हैं, तो हम अपने अस्तित्व में हलचल ले आते हैं। ये टॉक्सिन्स हमारे अंदर विचारों के रूप में प्रकट होकर, हमारे मन को उस शांत अवस्था में आने नहीं देते हैं जिसकी हमें तलाश है। जब हम अपना ध्यान बाहरी संसार के आकर्षणों से हटाकर अंतर की शांति पर एकाग्र करते हैं, तो हम धीरे-धीरे मन को शांत करने में और विचारों को रोकने में सफल रहते हैं। जब ध्यानाभ्यास में हमारी आत्मा प्रभु के प्रेम से जुड़ जाती है, तो हमारा मन और भी अधिक डीटॉक्स (विषमुक्त) होता जाता है, और धीरे-धीरे हमारे अंदर से समस्त टॉक्सिन्स निकल जाते हैं। जब हम अपने जीवन में प्रभु की उपस्थिति को महसूस करने लगते हैं, तो हमारा भय और व्यग्रता ख़त्म हो जाते हैं; जब हम प्रभु की बनाई सृष्टि के साथ अपनी एकता का अनुभव करने लगते हैं, तो हमारा क्रोध और ईर्ष्या समाप्त हो जाते हैं, तथा हम एक-दूसरे को अपना ही मानकर प्यार से गले लगा लेते हैं। इस तरह ध्यानाभ्यास हमारे मन को डीटॉक्स करने में मदद करता है, और एक विषमुक्त मन फिर हमें ध्यान टिकाने में और भी अधिक मददगार साबित होता है, जिससे हमें वो स्थाई खुशी मिल जाती है जिसकी हमें तलाश है। इस सबकी शुरुआत होती है रोज़ाना समय निकालकर नियमित रूप से ध्यान टिकाने से।