जाने देने की समझदारी

मई 15, 2022

आज संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने समझाया कि हम जीवन में दुख व तकलीफ़ की भावनाओं से कैसे निपट सकते हैं, ताकि वे हमें आध्यात्मिक विकास करने से न रोक सकें। जीवन में कई बार ऐसा समय आता है जब हमें दूसरों के कारण चोट पहुँचती है, जिससे हमें गहरा दर्द मिलता है। कई बार ऐसा भी होता है कि हमारे विचारों, शब्दों, या कार्यों से किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँचती है। जब कोई हमें चोट पहुँचाता है, तो क्रोधित हो उठना और प्रतिक्रिया करना बहुत आसान होता है। लेकिन क्रोध और प्रतिक्रिया करने से परिस्थिति और अधिक खराब होती जाती है, जिससे हमारा दर्द बढ़ता जाता है तथा हमारे जीवन में हलचल भी बढ़ती जाती है। उसी तरह, जब हमें एहसास होता है कि हमने जानते हुए या अनजाने में किसी को चोट पहुँचाई है, तो हम उस व्यक्ति को तकलीफ़ देने के एहसास से खुद दर्द व पछतावे से घिर जाते हैं।

संत-महापुरुष, प्रभु को पाने के लिए चीज़ों को ‘जाने देने’ की समझदारी के बारे में बताते हैं। जब हमारे अंदर दर्द, क्रोध, पछतावे, और पश्चाताप की भावनाएँ पैदा हो जाती हैं, तो हम उस चीज़ पर ध्यान नहीं टिका पाते हैं जो जीवन में सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है – हमारी आध्यात्मिक तरक्की, और प्रभु में लीन होने का हमारा लक्ष्य। हमें माफ़ करना और भूल जाना सीखना चाहिए। अगर किसी ने हमें चोट पहुँचाई है, तो हमें उन्हें माफ़ कर देना चाहिए, उस घटना को भूल जाना चाहिए, और आगे बढ़ जाना चाहिए। अगर हमने किसी को चोट पहुँचाई है, तो यह ज़रूरी है कि हम पछतावा करें और उस चीज़ को दोबारा कभी न करने का प्रण लें। उसके बाद, हमें खुद को माफ़ कर देना चाहिए, अपनी भूल से सबक सीखना चाहिए, और उसे फिर कभी न दोहराने का निश्चय करना चाहिए।

इस मामले में ध्यानाभ्यास हमारी मदद करता है। जब हम ध्यानाभ्यास करते हैं, तो हम अपना ध्यान बाहरी संसार से हटाकर, अंतर की शांति व स्थिरता पर एकाग्र करते हैं। जब हम अंदरूनी आध्यात्मिक यात्रा पर जाकर, अंतर में प्रभु के प्रेम व प्रकाश के साथ जुड़ जाते हैं, तो हम प्रभु के साथ अपनी एकता का अनुभव करने लगते हैं। हम इस सच्चाई को जान जाते हैं कि प्रभु के ज़रिये हम सब आपस में जुड़े हुए हैं, और हरेक में प्रभु बस रहे हैं। हम सबका एक ही लक्ष्य है। जब हमें इस सत्य का अनुभव हो जाता है, तो हम जान जाते हैं कि हमें एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए, और अपने साँझे लक्ष्य तक पहुँचने में एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। तब क्षमा और करुणा के सद्गुण हमारे अंदर आसानी से समा जाते हैं।

हर दिन एक उपहार है, और हमें उसे पूरी खुशी, उत्साह, और शांति के साथ जीना चाहिए। हमें अपनी आपसी एकता को पहचानना चाहिए, और इसकी शुरुआत होती है ध्यानाभ्यास के द्वारा अपनी आंतरिक शांति व स्थिरता का अनुभव करने से।