प्रभु के पास वापस पहुँचने की रेस
जीवन को रैट रेस, या चूहा दौड़, भी कहा जाता है, जिसमें लोग दिन-रात एक प्रतियोगिता भरी दिनचर्या में लगे रहते हैं, ताकि भौतिक दौलत और ख़ुशियाँ पा सकें। संत-महापुरुष एक अन्य रेस, या दौड़, की बात करते हैं – प्रभु के पास वापस पहुँचने की रेस, जो स्थाई ख़ुशियों और आध्यात्मिक ख़ज़ानों की ओर ले जाती है। आज संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने इस रेस के बारे में बताया और समझाया कि हम इसे कैसे जीत सकते हैं।
हमें यह मानव जन्म इसीलिए दिया गया है ताकि हमारी आत्मा प्रभु के पास वापस पहुँच सके, और हम सब वहाँ तक पहुँचने की रेस में शामिल हैं, महाराज जी ने फ़र्माया। एक रेस का लक्ष्य होता है अंतिम सीमारेखा तक सबसे कम समय में पहुँचना। प्रभु के पास वापस पहुँचने की रेस में अंतिम सीमारेखा है, हमारी आत्मा का मिलाप परमात्मा में करवाना। लेकिन यह ऐसी रेस नहीं है जिसमें हमें अपने साथी यात्रियों से प्रतियोगिता कर, अकेला विजेता बनना है। इसके बजाय, यह एक ऐसी रेस है जिसमें अंत में हम सबकी जीत होनी है। इस रेस में भाग लेने के लिए हमें ध्यानाभ्यास के द्वारा आंतरिक आध्यात्मिक यात्रा पर जाना होगा, ताकि हम स्वयं प्रभु के प्रेम व प्रकाश का अनुभव कर सकें।
भौतिक संसार की किसी भी रेस की तरह ही, आध्यात्मिक क्षेत्र में भी सफलता के लिए कुछ चीज़ें आवश्यक होती हैं। सबसे पहले, ध्यानाभ्यास में एकाग्र होने के लिए हमें पूरी तरह से जागृत अवस्था में होना होगा। दूसरे, अपनी तकनीक में महारत हासिल करने के लिए हमें प्रतिदिन अभ्यास करना होगा। तीसरे, इस रेस में जीतने के लिए हमें अपने मानसिक रवैये को बदलना होगा। हमें जानना होगा कि हमारा लक्ष्य क्या है, तथा इस बात पर विश्वास करना होगा कि हम उस लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं और इसी जीवन में प्रभु का अनुभव कर सकते हैं। इस विश्वास के साथ आती है अंतिम सीमारेखा तक पहुँचने की लगन व जोश। घोड़ों की रेस में जिस तरह घोड़ों पर ब्लाइन्डर्स लगाए जाते हैं ताकि वो यहाँ-वहाँ न देख सकें, यह जोश हमें अपनी पंक्ति में केंद्रित रखता है और अपने लक्ष्य पर एकाग्र रखता है, चाहे हमारे मार्ग में कितनी ही बाधाएँ क्यों न आयें। संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया कि सबसे बढ़कर, प्रभु की ओर वापस जाने वाली रेस में हमारी ओर से सच्चे प्रयास की ज़रूरत होती है। अगर हम रोज़ाना ध्यानाभ्यास में समय देने का निर्णय कर लें, और इस रेस में जीतने के लिए पूरी लगन से प्रयास करें, तो हम अपने लक्ष्य तक इसी जीवनकाल में पहुँच सकते हैं।