सबसे पहले, ख़ुद को जानो
जीवन के किसी न किसी मोड़ पर, नुकसान या दुख-दर्द या मुश्किलें सहने के बाद, हम जीवन के अर्थ पर सवाल उठाने लगते हैं। हम सृष्टि के रहस्यों को जानना चाहते हैं – हम कौन हैं? हम यहाँ क्यों आए हैं? क्या इस जीवन के पश्चात् भी जीवन है? मौत के बाद हम कहाँ चले जाते हैं? आज संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने हमारे अस्तित्व पर और प्रभु के साथ हमारे संबंध पर प्रकाश डाला। यह मानव चोला, महाराज जी ने समझाया, हमें इसीलिए दिया गया है ताकि हम अपने स्रोत, प्रभु, के पास वापस जा सकें।
इस लक्ष्य को पाने के लिए पहले अपने सच्चे स्वरूप को जानना ज़रूरी है। हमारे सोचने के विपरीत, हम वो शरीर या चेहरा नहीं हैं जिसे हम हर रोज़ शीशे में देखते हैं। हमारा सच्चा स्वरूप आत्मा है। आत्मा, परमात्मा का अंश है और इस शरीर में निवास करती है; यही इस शरीर को जान देने वाली ताकत है। जब हम अपने सच्चे स्वरूप को जान जाते हैं, तो हमें अपने स्रोत की याद आती है, तथा हमें आत्मा के परमात्मा से बिछुड़ने की कहानी भी याद आ जाती है। प्रभु के साथ अपने बिछोड़े का अनुभव होते ही हमारे अंदर गहरी तड़प पैदा हो जाती है। इससे हमारे अंदर अपने सच्चे घर वापस जाने की लगन जाग उठती है।
तो हम अपने सच्चे स्वरूप को कैसे जान सकते हैं? ऐसा हम ध्यानाभ्यास की विधि द्वारा कर सकते हैं। ध्यानाभ्यास में हम अपने ध्यान को बाहरी संसार के आकर्षणों से हटाकर अंतर में एकाग्र करते हैं। इस आध्यात्मिक यात्रा पर जाने से हम ख़ुद को आत्मा के रूप में अनुभव कर पाते हैं और प्रभु के प्रेम व प्रकाश के साथ जुड़ जाते हैं, जिससे हमारी आत्मा पोषित व मज़बूत होती है। जीवन के सभी रहस्य हमारे सामने खुल जाते हैं, और हमें अपने सभी सवालों के जवाब मिल जाते हैं।