प्रेम व प्रकाश के पुल पर चलें

जून 5, 2022

पिछले दो सालों ने हमें बदल दिया है। काफ़ी लोगों ने अलग होने और खो देने की पीड़ा को महसूस किया है, और इससे हमें अपने जीवन के बारे में सोच-विचार करने की, और अपने अस्तित्व के बारे में सवाल पूछने की, प्रेरणा मिली है। हम कौन हैं, और यहाँ क्यों आए हैं? क्या हमारे जीवन का कोई उद्देश्य है? मृत्यु के बाद हम कहाँ जाते हैं? अगर शरीर मौत के बाद भी कायम रहता है, तो वो क्या चीज़ है जो वास्तव में मरती है? ऐसे सवाल हमारी आध्यात्मिक तलाश की शुरुआत होते हैं। हम समझ जाते हैं कि शरीर के अलावा भी हमारा कोई अस्तित्व है। हम जान जाते हैं कि कोई ताकत इस शरीर को जान दे रही है – और वो है प्रभु की ताकत।

अपने मौलिक रूप में हम आत्मा हैं। हमारी आत्मा को प्रभु से बिछुड़े बहुत लंबा समय हो गया है, और उसे अपने स्रोत से अलग होने की बेहद तकलीफ़ है। वो प्रभु से मिलने के लिए तड़प रही है। विरह की यह पीड़ा हमें आध्यात्मिक यात्रा पर जाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि हम प्रभु को ढूंढ सकें और उनसे एकमेक हो सकें। अपने आप हम इस भवसागर को पार कर, प्रभु के पास वापस नहीं पहुँच सकते हैं। हमें न तो इसका तरीका मालूम है, और न ही हमारे पास ऐसा करने के साधन व कौशल मौजूद हैं। यहीं हमें एक पूर्ण संत की मदद व मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है, जो एक कुशल बढ़ई की तरह हमें प्रेम व प्रकाश का पुल बनाने में मदद करता है, जो पुल हमें प्रभु के पास वापस ले जाता है। संत हमें यह पुल बनाने में मदद करते हैं ध्यानाभ्यास की तकनीक सिखाकर, जिससे हम आंतरिक रूहानी मंडलों की यात्रा पर जाकर वहाँ के प्रेम, ख़ुशी, और आनंद का अनुभव कर सकते हैं। ध्यानाभ्यास वो प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम प्रेम व प्रकाश के पुल पर चलते हैं और प्रभु की ओर वापस बढ़ते जाते हैं। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए, हमें रोज़ाना ध्यानाभ्यास कर इस यात्रा पर नियमित रूप से आगे बढ़ते जाना चाहिए। तब हम प्रतिदिन पिछले दिन की प्रगति से आगे बढ़ते चले जायेंगे।