निराशा के समय में आशा पाना

जून 4, 2022

निराशा तब पैदा होती है जब चीज़ें हमारी इच्छानुसार नहीं होती हैं। हमें लगता है कि दुनिया में सबकुछ हमारे खिलाफ़ हो रहा है और हमारा जीवन अब कभी भी बेहतर नहीं होगा। ऐसे ही हर नए विचार के साथ हमारा मन नकारात्मकता के भँवर में डूबता जाता है। ऐसे समय में हम उन गतिविधियों या कार्यों को त्याग देते हैं जो हमारे मददगार साबित हो सकते हैं। इसके बजाय हम उस स्थिति का सामना करने के लिए, या अपने खालीपन को भरने के लिए, हानिकारक आदतें अपना लेते हैं। लेकिन, महाराज जी ने समझाया, ऐसे निराशा के क्षणों में हमें उन आदतों को बनाए रखने के लिए ख़ास तौर पर मेहनत करनी चाहिए जो हमारी मदद करती हैं। हमें चाहे जितना भी ख़राब महसूस हो रहा हो, लेकिन ऐसे समय पर हमें अपनी अंदरूनी ताकत को बनाए रखने का विशेष प्रयास करना चाहिए।

ऐसे समय पर हमें सुकून व चैन पाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि हम अपनी सामान्य अवस्था में वापस पहुँच सकें। हम निराशा के वक़्त में सुकून कैसे पा सकते हैं? ऐसा तब होता है जब हम प्रभु के साथ अपने संबंध को मज़बूत करते हैं। प्रभु समस्त ख़ुशियों, ज्ञान, प्रेम, शांति और आनंद के महासागर हैं। प्रभु हमारा अतीत, वर्तमान, और भविष्य, सबकुछ जानते हैं। जब हम ध्यानाभ्यास के द्वारा इस दिव्य सत्ता के साथ जुड़ जाते हैं, तो हम उस प्रेम व ख़ुशी का अनुभव करने लगते हैं जो पहले से ही हमारे अंदर मौजूद है, और जो हमें अपनी ख़राब मनोस्थिति से बाहर आने में मदद करती है।

निराशा के समय में आशा बनाए रखने की कुंजी है, संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया, अपने ध्यान को वर्तमान परिस्थिति से हटाना, और उसे अपने अंतर में ख़ुशी व शांति के असीम स्रोत पर टिकाना। जब हम ध्यानाभ्यास में प्रभु के प्रेम का अनुभव करते हैं, तो हम निश्चिंत हो जाते हैं कि प्रभु हर समय हमसे प्रेम कर रहे हैं और हमारी सुरक्षा कर रहे हैं। हमें केवल इस प्रेम के साथ जुड़ने की ज़रूरत है, और ऐसा हम तब कर सकते हैं जब हम मौन अवस्था में बैठने के लिए समय निकालते हैं और प्रभु के संपर्क में आते हैं।