आत्मा की जीत
आज संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने लाइल, इलिनोई, के साइंस ऑफ़ स्पिरिच्युएलिटी इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर में एक शक्तिशाली संदेश दिया। उन्होंने हमें जीवन के असली उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित कियाः प्रभु के साथ एकमेक होना।
हमारे शरीर के अंदर हमारी आत्मा है, जोकि परमात्मा का अंश है, महाराज जी ने समझाया। आत्मा का इस मानव चोले में आने का एकमात्र मक़सद यही है कि वो अंदरूनी यात्रा पर जा सके और प्रभु के पास वापस पहुँच सके। हमारे शरीर में मन भी मौजूद है। आत्मा के विपरीत, हमारा मन बाहरी संसार पर एकाग्र रहता है और इच्छाओं से भरा रहता है। उसमें इन इच्छाओं को पूरा करने की तीव्र ललक होती है। ये इच्छाएँ हमारे क्रोध, लोभ, धोखे, मोह, और अहंकार को बढ़ावा देती हैं, जिससे हमारे जीवन में हलचल आ जाती है और हम अपने आध्यात्मिक लक्ष्य से भटक जाते हैं।
इस तरह, हमारे अंदर दो शक्तियाँ काम कर रही होती हैं: हमारी आत्मा और हमारा मन, जो हमारे ध्यान को विपरीत दिशाओं में खींचती रहती हैं। इस खींचतान में हमारा अंत:करण फँसा रहता है, वो धीमी आवाज़ जो धीरे से हमें पुकारती रहती है, और हमें सही रास्ते पर जाने के लिए प्रेरित करती रहती है। हमारा अंत:करण ही हमें सही और गलत के बीच का फ़र्क बताता है। हमें सतर्क रहना चाहिए कि हम अपने मन की इच्छाओं के आगे हार मानकर गलती से इस आवाज़ को बंद न कर दें।
हमारी आत्मा की हमारे मन पर जीत को सुनिश्चित करने के लिए, हमें अपनी आत्मा को मज़बूत करना होगा। ऐसा तब होता है जब हम शांत अवस्था में बैठते हैं, और ध्यानाभ्यास में विचार-रहित अवस्था में पहुँच जाते हैं। जब हमारी आत्मा आंतरिक आध्यात्मिक यात्रा पर जाती है, तो वो प्रभु की दिव्य ज्योति के साथ जुड़ जाती है, जिससे उसे मज़बूती व पोषण मिलता है।