ध्यानाभ्यास के द्वारा नम्रता का विकास करें
नम्रता इस बात को पहचानना है कि हम सब एक ही हैं; कि कोई भी किसी से ऊँचा या नीचा नहीं है। यह इस बात को पहचानना है कि चाहे हम सबका बाहरी जीवन अलग-अलग हो, चाहे हम देखने में अलग-अलग हों या हमारी जीवनशैली अलग-अलग हो, लेकिन असल में हम सब एक ही हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए हमें अपनी शारीरिक चेतनता से ऊपर उठना होगा।
अगर हम शारीरिक स्तर तक ही रह जायेंगे, तो हम केवल इस भौतिक संसार में दिखने वाले लोगों या चीज़ों से ही जुड़े रहेंगे, और जब तक ऐसा होता रहेगा, तब तक हम केवल बाहरी भिन्नताओं को ही देख पायेंगे। जब हम ध्यानाभ्यास के द्वारा अपनी शारीरिक इंद्रियों से ऊपर उठ जाते हैं, तो हम आंतरिक आध्यात्मिक यात्रा पर जा पाते हैं, तथा स्वयं को आत्मा के रूप में, परमात्मा के अंश के रूप में, अनुभव कर पाते हैं, तथा जान जाते हैं कि हम प्रभु के प्रेम व प्रकाश से भरपूर हैं। हम यह भी जान जाते हैं कि प्रभु का एक अंश दूसरों के अंदर भी है। हमारी बाहरी भिन्नताओं से परे, हम सब बिल्कुल एक समान हैं – हम आत्माएँ हैं जो प्रभु से बिछुड़ चुकी हैं। हम सभी अपने सच्चे घर वापस जाने की यात्रा पर चल रहे हैं। जब हमें यह एहसास हो जाता है, तो हम अपने जीवन में नम्रता को ढाल लेते हैं।