हम अकेले नहीं हैं। प्रभु हमारे साथ हैं।
जीवन के किसी न किसी मोड़ पर, हमें अकेलेपन की तकलीफ़ झेलनी पड़ती है। ऐसे समय पर हमें लगता है कि हमारा साथ देने वाला कोई भी नहीं है, और हम निराश हो जाते हैं, तथा चिंता और व्यग्रता से घिर जाते हैं। असहाय होकर हम किसी ऐसे सहारे की तलाश करने लगते हैं जो जीवन के तूफ़ानों का सामना करने में हमारी मदद कर सके।
आज लाइल, इलिनोई, में अपने सत्संग में, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने समझाया कि सभी धर्मग्रंथ हमें बताते हैं कि प्रभु सदा हमारे साथ हैं, हमें सहारा दे रहे हैं। हम हमेशा प्रभु से मदद माँग सकते हैं, फिर भी हमें अकेलापन महसूस होता है। ऐसा क्यों? इसलिए क्योंकि हम अपनी भौतिक इंद्रियों के स्तर पर जीने के आदी हैं। महाराज जी ने समझाया कि हमारी शारीरिक आँखें वही देख पाती हैं जो भौतिक पदार्थ का बना हो। हमारे कान इस भौतिक संसार की कुछ फ्रीक्वैन्सी ही सुन पाते हैं। हमारी सभी इंद्रियाँ सीमित हैं।
लेकिन प्रभु पूर्ण रूप से चेतन हैं। प्रभु बेहद सूक्ष्म हैं और उन्हें भौतिक इंद्रियों के द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता है। प्रभु का अनुभव करने के लिए हमें उन संतों-महापुरुषों के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए जो हरेक समय में आते रहे हैं। उनमें से हरेक ने प्रभु को मौन अवस्था में ही पाया था। जब हम बाहरी संसार के शोर से अपना ध्यान हटाते हैं, शांत अवस्था में बैठते हैं, और अपने शरीर व मन को शांत करते हैं, तो हम शारीरिक चेतनता से ऊपर उठ जाते हैं और आंतरिक यात्रा पर जा पाते हैं। तब हम प्रभु के संपर्क में आ जाते हैं और स्वयं प्रभु की उपस्थिति का अनुभव कर पाते हैं। जितना अधिक हम शांत अवस्था में बैठेंगे और अंतर में एकाग्र होंगे, उतना ही हम प्रभु के करीब पहुँचते जायेंगे, और जल्द ही अपनी आत्मा का मिलाप परमात्मा में करवाकर जीवन के उद्देश्य को पूरा कर लेंगे।
जब हम प्रभु की उपस्थिति का अनुभव करने लगते हैं, तो हम प्रभु के प्रेम में सहारा पा लेते हैं। तब हम जीवन की चुनौतियों से घबराते नहीं हैं, बल्कि “ये समय भी बीत जाएगा” की भावना रखकर जीते हैं। जब हम पक्की तरह से जान जाते हैं कि हम अकेले नहीं है, तब हमें कभी भी अकेलेपन का दुख नहीं सताता है।