ध्यानाभ्यास के द्वारा अपने जीवन को वातानुकूलित करें
780 दिनों में पहली बार, आज संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने लाइल, इलिनोई के एस.ओ.एस. इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर में श्रोताओं के सामने शारीरिक रूप से सत्संग फ़र्माया। महाराज जी ने सेंटर में सबका स्वागत किया और एक बार फिर सबके साथ मौजूद होने पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने पिछले दो सालों से सम्पूर्ण विश्व द्वारा झेली गई कठिनाइयों का उल्लेख किया और सबको याद दिलाया कि बुरा समय आखिरकार गुज़र ही जाता है। जीवन की मुसीबतों और समस्याओं से भी कुछ न कुछ अच्छा निकल ही आता है। हमें याद दिलाते हुए कि ध्यानाभ्यास हमें जीवन के उतार-चढ़ाव का सामना करने में मदद करता है, महाराज जी ने फ़र्माया कि बाहरी संसार का जीवन हमेशा कठिन ही रहेगा क्योंकि वो लगातार बदल रहा है और हलचल से भरपूर है।
हम हमेशा-हमेशा की खुशियाँ और शांति तभी पा सकते हैं जब हम बाहरी दुनिया के आकर्षणों और मनोरंजनों से ध्यान हटाकर, ध्यानाभ्यास के द्वारा अपने अंतर की शांति पर ध्यान टिकायें। ध्यानाभ्यास हमारे जीवन को इस तरह वातानुकूलित कर देता है कि हम बाहरी संसार के दुख-दर्द से अप्रभावित रहते हैं। जब तक हम बाहरी संसार से ध्यान हटाना नहीं सीखेंगे, तब तक हम जीवन के पैन्डुलम पर झूलते ही रहेंगे। ध्यानाभ्यास के द्वारा ही हम सच्ची खुशी का अनुभव कर सकते हैं। ध्यानाभ्यास एक अभ्यास है, और हमें इसे लगातार करते रहना चाहिए जब तक हम इसमें माहिर न हो जायें। हमें पहले इसके आधारभूत नियमों की ओर ध्यान देना चाहिए , संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया। एक शांत जगह ढूँढें, शरीर को शांत करें, मन को शांत करें, और फिर अपने अभ्यास पर मेहनत करें। ऐसा करने से धीरे-धीरे हम अपने अभ्यास की कमियों को दूर कर पायेंगे और ध्यानाभ्यास में माहिर हो जायेंगे।