ध्यानाभ्यास के दौरान विचारों को कैसे रोकें
जब हम ध्यानाभ्यास करने के लिए बैठते हैं और अपनी आँखें बंद करते हैं, तो हमारे मन में तुरंत बहुत सारे विचार उठने लगते हैं जो हमें ध्यान एकाग्र करने से रोकते हैं। आज एस.ओ.एस. इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर में एकत्रित श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने विचारों की प्रकृति के बारे में समझाया और यह बताया कि हम कैसे उन पर काबू पा सकते हैं।
सारा दिन हमारे मन में विचार आते रहते हैं, महाराज जी ने फ़र्माया। लेकिन जब हम सांसारिक गतिविधियों की ओर ध्यान एकाग्र किए रहते हैं, तो हमें यह खयाल नहीं रहता कि हमारे मन में विचार आ रहे हैं। इसके विपरीत, जब हम ध्यानाभ्यास करने के लिए बैठते हैं और अपनी आँखें बंद करते हैं, तो अचानक, उस चुप्पी में, वो विचार जो दिन भर हमारे मन में चल रहे थे अब हमें तेज़ सुनाई देने लगते हैं। हमारा ध्यान उनकी ओर जाने लगता है और हमें उनका एहसास होने लगता है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि हम अभी अपने मन को शांत करने के तरीके में माहिर नहीं हुए हैं, संत राजिन्दर सिंह जी ने समझाया। ये विचार तभी जाते हैं जब हमारे मन का ध्यान उनकी ओर नहीं रहता है।
इसकी कुंजी है ऐसी अवस्था में पहुँच जाना जहाँ हमें कोई विचार न आयें। ऐसा करने के लिए हमें किसी शांति भरे शब्द को मन ही मन दोहराकर अपने मन को शांत करना होगा। इस तरह, मन में हमें विचार भेजने की ताकत नहीं रहती है। साथ ही, हमें अपनी आंतरिक दृष्टि को एकाग्र करने के कौशल का विकास करना चाहिए। यह उदाहरण देते हुए कि कैसे बच्चे घंटों तक टीवी स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए बैठे रहते हैं, महाराज ने समझाया कि हमें भी अपने अंतर की स्क्रीन पर ध्यान टिकाकर अपने अस्तित्व की सच्चाइयों का अनुभव करना चाहिए। जैसे-जैसे हमारी एकाग्रता बढ़ती जाएगी, हमारा ध्यान भटकना बंद हो जाएगा। ज़रूरत है तो केवल नियमित अभ्यास करने की, और धीरे-धीरे ऐसी अवस्था में पहुँचने की जिसमें हम अंतर की स्क्रीन में इतने एकाग्र हो जायें कि कोई भी चीज़ हमें उस अनुभव से भटका न पाए।