स्वास्थ्य और ख़ुशी के लिए ध्यानाभ्यास

अगस्त 12, 2024

चार साल के अंतराल के बाद, उत्तरी अमेरिका के सबसे बड़े फूड फ़ैस्टिवल्स में शामिल, शाकाहारी भोजन और जीवनशैली का समारोह, वैजी फ़ैस्ट, एक बार फिर लौट आया। ये समारोह 10 और 11 अगस्त को लाइल, इलिनोई (यू.एस.ए.) में आयोजित किया गया, और इसमें हज़ारों लोगों ने भाग लिया। इसके दोनों दिन संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने सत्संग फ़र्माया। दोनों सत्संगों के कुछ मुख्य बिंदु यहाँ दिए जा रहे हैं।

हम दुखी क्यों हैं, महाराज जी ने सवाल रखा? इसलिए क्योंकि हम गलत जगह में ख़ुशियाँ ढूंढ रहे हैं। हम बाहरी जीवन में ख़ुशियाँ तलाश करते रहते हैं, लेकिन बाहरी जीवन तो उतार-चढ़ाव से भरपूर है, जिससे हमारा जीवन एक पैन्डुलम बन जाता है, जो ख़ुशी और दुख के पलों के बीच झूलता रहता है।

सच्ची ख़ुशी, महाराज जी ने समझाया, हमारे भीतर ही है, और उसे हम ध्यानाभ्यास के द्वारा पा सकते हैं। ध्यानाभ्यास के द्वारा हम अपने अंतर में समस्त प्रेम और ख़ुशी के स्रोत के साथ जुड़ जाते हैं। तब हम ऐसे आनंद का अनुभव करते हैं जो बाहरी जीवन के उतार-चढ़ाव से अप्रभावित रहता है। दिव्य प्रेम के साथ यह संपर्क हमारी आत्मा को शक्ति देता है और उसे मज़बूत बनाता है। जब हमारी आत्मा पोषित होती है, तो हमारे शरीर और मन की सेहत भी अपने आप ही सुधरने लगती है।

जब हम अपने अंदर प्रभु के प्रकाश पर ध्यान टिकाते हैं, तो हम सभी में प्रभु के प्रकाश को देखने लगते हैं, और सबको प्रभु का अंश ही समझने लगते हैं। ध्यानाभ्यास से हमारा नज़रिया विशाल हो जाता है, और हम दुनिया भर के साथ अपनी एकता को महसूस करने लगते हैं।

संत राजिन्दर सिंह जी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि आज ध्यानाभ्यास दुनिया भर में प्रचलित हो गया है, और अनेकों लोग आज इसके शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक लाभों के लिए इसे अपना रहे हैं। लेकिन ध्यानाभ्यास करने की असली वजह आध्यात्मिक है – वो है अपनी आत्मा का अनुभव करना, परमात्मा का अनुभव करना, और परमात्मा के साथ अपनी आत्मा के रिश्ते का अनुभव करना। ध्यानाभ्यास में हम प्रभु की दिव्य ज्योति के साथ जुड़ जाते हैं, जो हमारी आत्मा को पोषित करती है और शक्तिशाली बनाती है।

हर सत्संग के बाद, महाराज जी ने श्रोताओं को ध्यानाभ्यास संबंधी मूल निर्देश दिए और थोड़ी देर के लिए ध्यान में बैठा दिया। जितना अधिक हम रोज़ाना ध्यानाभ्यास करेंगे, महाराज जी ने फ़र्माया, उतना ही हमारी आत्मा और परमात्मा का रिश्ता मज़बूत होता चला जाएगा।