आक्रमण ही सबसे अच्छा बचाव है

जुलाई 31, 2022

ध्यानाभ्यास एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा हम अपने सच्चे आत्मिक स्वरूप का अनुभव कर सकते हैं, तथा आंतरिक रूहानी मंडलों की यात्रा पूरी कर अपनी आत्मा का मिलाप परमात्मा में करवा सकते हैं। हालाँकि मौन अवस्था में बैठने और इंद्रियों को अंतर्मुख करने की यह प्रक्रिया सरल लग सकती है, लेकिन इसमें सफलता प्राप्त करने के लिए हमें कुछ बाधाओं पर विजय पानी होती है। सबसे बड़ी बाधा आती है मन की ओर से। अपनी कई चालों व तरक़ीबों के द्वारा मन हमारे ध्यान को बाहरी संसार में लगाए रखता है, ताकि हम अंतर में ध्यान न टिका पायें। जब तक हमारा ध्यान बाहरी दुनिया में एकाग्र रहेगा, तब तक हम परमात्मा से एकमेक होने के अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर पायेंगे।

जिस तरह पुरातन काल के राज्य अपने शत्रुओं को दूर रखने के लिए ऊँची-ऊँची दीवारों का निर्माण करते थे, उसी तरह हमें भी ध्यानाभ्यास के समय अपने चारों ओर एक सुरक्षात्मक दीवार की ज़रूरत है। यह सुरक्षात्मक दीवार मन से लड़ती नहीं है, जोकि एक बहुत ही शक्तिशाली शत्रु है। इसके बजाय, संत-महापुरुष हमें एक सुरक्षात्मक विधि सिखाते हैं जिसमें हम अपने मन से मित्रता कर लेते हैं, और मन की विशेषताओं का लाभ उठाते हैं। हमारा मन आदतों का गुलाम है, और हम उसकी इस विशेषता का लाभ उठाकर नियमित ध्यान टिकाने की आदत का विकास कर सकते हैं। हम प्रभु की ओर एकाग्र होने के लिए मन की ऊर्जा का उपयोग करते हैं, और मन ही मन प्रभु के नामों का जाप करते हैं। जब हम ऐसा करते हैं, तो मन हमें ऐसे विचार नहीं भेज पाता है जिनसे हमारी एकाग्रता भंग हो जाए। प्रभु के नामों का यह जाप उस सुरक्षात्मक दीवार की तरह काम करता है जो सभी विचारों और व्यवधानों को दूर रखती है, ताकि हम अपने ध्यान को प्रभु की ओर लगा सकें।