ध्यानाभ्यास में मन से मित्रता करें

जुलाई 30, 2022

हमारा मन हमेशा बाहरी संसार के आकर्षणों और व्यवधानों में लिप्त रहता है। इसीलिए, मन हमारी आत्मा के प्रभु के पास वापस लौटने की यात्रा में एक बाधा है। जब हम ध्यानाभ्यास करते हैं, तो हम अपनी आत्मा को सशक्त करते हैं, और इसे इसकी अंदरूनी ताक़त के प्रति जागृत करते हैं। जब हमारी आत्मा सशक्त होती है और प्रभु के पास वापस जाने वाली अपनी यात्रा की शुरुआत करती है, तो उसे एहसास होता है कि मन उसकी इस यात्रा में एक बहुत बड़ी बाधा है। लेकिन वो मन से लड़ नहीं सकती है। इसके बजाय, आगे बढ़ने के लिए उसे मन को अपना मित्र बनाना होगा। इसीलिए, वो मन को अंदरूनी दुनिया की ख़ुशियों से मोहित करती है, और उसे भी आंतरिक यात्रा पर चलने के लिए प्रेरित करती है, ताकि वो भी उन ख़ज़ानों का अनुभव कर सके जो अंतर में हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

जब ऐसा होता है, और हमारा मन आंतरिक मंडलों के आनंद व प्रेम का अनुभव करने लगता है, तो वो हमारा मददगार साथी और मित्र बन जाता है। जितना अधिक हम ध्यानाभ्यास करते हैं, उतने ही अधिक आनंद का अनुभव हम करते जाते हैं, और उतना ही अधिक हमारा मन शांत होता जाता है। जब हमारी आत्मा और मन, दोनों ही अंदरूनी संसार की ख़ुशियों पर केंद्रित होते हैं, और जब हम अपने अंदर मौजूद परमानंद का अनुभव करते हैं, तो हम बाहरी जीवन के तनावों और परेशानियों का सामना भी बेहतर तरीक़े से कर पाते हैं।