प्रभु की ओर दृढ़ता से कदम बढ़ायें
दिल्ली में आज अपने सत्संग में संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने समझाया कि प्रभु का प्रेम हमें हर पल घेरे रहता है। लेकिन हम उसका अनुभव नहीं कर पाते हैं क्योंकि हमारा ध्यान बाहरी संसार में ही लगा रहता है। प्रभु के प्रेम का अनुभव करने के लिए हम अपने ध्यान को बाहरी संसार से हटाकर, ध्यानाभ्यास के द्वारा अपने अंतर में एकाग्र करना होगा।
प्रभु प्रेम के महासागर हैं, और हमारी आत्मा इस महासागर की एक बूँद होने के नाते प्रेम से भरपूर है। प्रेम के बारे में हज़ारों किताबें लिखी गई हैं, लेकिन दिव्य प्रेम क्या है और यह कैसे विकसित होता है, ये समझ केवल प्रेम के बारे में पढ़ने या सुनने से नहीं आ सकती है। एक पूर्ण सत्गुरु हमें ध्यानाभ्यास का तरीका सिखाते हैं, जो हमें स्वयं प्रभु के प्रेम का अनुभव करने में मदद करता है, तथा वे हमारा मार्गदर्शन कर हमें अपने असली आत्मिक स्वरूप के प्रति जागृत करते हैं।
सभी धर्म हमें एक प्रेमपूर्ण, करुणामयी, अहिंसक, और सच्चा जीवन जीने के लिए प्रेरित करते हैं। संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने समझाया कि हमें इससे भी एक कदम आगे जाकर स्वयं प्रभु का अनुभव करने के लक्ष्य को सामने रखना चाहिए। धीरे-धीरे, एक नैतिक जीवन जीने से और ध्यानाभ्यास में नियमित रूप से समय देने से, हम प्रभु की ओर दृढ़ता से कदम बढ़ाते जायेंगे। हम सत्संगों में जाने से भी लाभ उठा सकते हैं, जहाँ सत्य के अन्य जिज्ञासु भी एकत्रित होते हैं, उन्होंने फ़र्माया। दूसरों की संगति हमें भी ध्यानाभ्यास में अधिक से अधिक समय देने के लिए प्रेरित कर सकती है। संत राजिन्दर सिंह जी ने प्रार्थना की कि जो लोग प्रभु को जानना चाहते हैं, वे आपसी एकता व सौहार्द की भावना के साथ तेज़ी से इस मार्ग पर तरक्की करते चले जायें।