प्रभु के उपहारों की ख़ुशी मनायें
फ़ादर्स डे (पिता दिवस) ऐसा दिन है जब हम अपने पिता का और उनके द्वारा दिए गए सभी उपहारों का सम्मान करते हैं। उनका प्रेम, मार्गदर्शन, और सहारा हमें इस संसार को समझने में मदद करता है, और इसमें जीने व आगे बढ़ने में मदद करता है। इस दिन हमें अपने परमपिता, प्रभु, को और उनके द्वारा दिए गए सभी उपहारों को भी याद करना चाहिए।
संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने समझाया कि हमारी आत्मा को प्रभु से बिछुड़े हुए अनेकों युग बीत चुके हैं। हमारी आत्मा को इस मानव चोले में आने का उपहार मिला है, क्योंकि केवल मानव चोले में ही हमारी आत्मा, प्रभु के पास वापस पहुँच सकती है। बहुत कम लोगों को प्रभु को जानने की तड़प का दूसरा उपहार मिलता है। उन्हें ऐसे लोगों की संगत में पहुँचा दिया जाता है जो उन्हीं की तरह सत्य की तलाश कर रहे होते हैं। तीसरा और सबसे अमूल्य उपहार सत्गुरु के ज़रिये दिया जाता है, जो हमें ध्यान-अभ्यास की प्रक्रिया सिखाते हैं जिसके द्वारा हमारी आत्मा, आंतरिक आध्यात्मिक यात्रा पर जा पाती है।
ध्यान-अभ्यास के द्वारा हमारा ध्यान बाहरी संसार के आकर्षणों से हट जाता है, और हम अंतर में प्रभु की उपस्थिति पर ध्यान टिका पाते हैं। तब हम जान जाते हैं कि प्रभु हमेशा हमारा मार्गदर्शन व रक्षा कर रहे हैं, और हमें सहारा प्रदान कर रहे हैं। प्रभु के प्रेम की निरंतर उपस्थिति में, हम अपना जीवन ख़ुशी-ख़ुशी बिताने लगते हैं। हम प्रभु की बनाई सृष्टि के साथ भी एकता का अनुभव करने लगते हैं, और दूसरों की सेवा-सहायता करने का प्रयास करते हैं, महाराज जी ने फ़र्माया। ऐसा करने से, हम अपना जीवन वैसे ही जीने लगते हैं जैसे कि हमें जीना चाहिए – प्रेमपूर्वक और निष्काम भाव के साथ।
हमें हर दिन की शुरुआत प्रभु के शुक्राने के साथ करनी चाहिए, और ख़ुद से पूछना चाहिए कि हम प्रभु द्वारा मिले उपहारों से पूरा-पूरा लाभ कैसे उठा सकते हैं, ताकि हमें मिला यह सुनहरा अवसर बेकार न चला जाए। हमें अपनी हर साँस के साथ प्रभु का शुक्राना करना चाहिए, संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया। इसी के साथ हमें एक अन्य उपहार को भी ध्यान में रखना चाहिए, और वो उपहार ऐसा है जो केवल हम ही ख़ुद को दे सकते हैं। वो उपहार है हर दिन समय निकालकर ध्यान-अभ्यास में बैठना, ताकि हम अपने मानव चोले से पूरा-पूरा लाभ उठा सकें।