हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ रत्न
संत राजिन्दर सिंह जी महाराज दिल्ली से दक्षिण-पश्चिम में 570 मील दूर स्थित अहमदाबाद शहर पधारे। रिवरफ्ऱन्ट इवेन्ट सेंटर में महाराज जी का पहले दिन का सत्संग प्रभु-प्राप्ति पर आधारित था। यह उद्देश्य हमारे जीवन का सबसे बड़ा खज़ाना है, और कोई भी भौतिक संपदा इसका मुकाबला नहीं कर सकती है।
महाराज जी ने समझाया कि हम सबको जन्म के समय एक नाम दिया जाता है, जो फिर आगे के पूरे जीवन में हमारी पहचान बन जाता है। लेकिन ये नाम हमारे शरीर का होता है, जबकि हमारा सच्चा स्वरूप तो हमारी आत्मा है। हमारी आत्मा, प्रभु का अंश है, तथा प्रभु के प्रेम, प्रकाश, व आनंद से भरपूर है। हम उस सच्चे नाम, या प्रभु के शब्द, के साथ जुड़कर अपने सच्चे स्वरूप को जान सकते हैं जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है और जो हर समय हमारे अंदर गूँज रहा है। हम अपनी तीसरी या अंदरूनी आँख पर ध्यान टिकाकर इस आंतरिक आंनद और प्रकाश का अनुभव कर सकते हैं, जो आंतरिक मंडलों में जाने का प्रवेशद्वार है।
संत कृपाल सिंह जी महाराज की शिक्षा “नेक बनो, नेकी करो, एक बनो” का उल्लेख करते हुए संत राजिन्दर सिंह जी ने फ़र्माया कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए सद्गुणों का विकास करना बहुत ज़रूरी है। वर्तमान में हम द्वैत में जी रहे हैं क्योंकि हमने अपने आसपास बहुत सारी दीवारें खड़ी कर ली हैं, जो हमारे शरीर के साथ जुड़ी होती हैं, तथा दूसरों से बेहतर व अलग होने की हमारी इच्छा को दर्शाती हैं। हमारा उद्देश्य है प्रभु के साथ एकमेक होना, तथा प्रभु और प्रभु की बनाई सृष्टि के साथ अपनी एकता को पहचानना। हमें दूसरों को अपना ही मानना चाहिए और सबको प्रभु के एक ही परिवार का सदस्य समझना चाहिए। हमें अहिंसा, सच्चाई, पवित्रता, नम्रता, करुणा, और सबसे प्रेम जैसे सद्गुणों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। हमें निष्काम सेवा में समय बिताना चाहिए, ताकि प्रभु ने जो हमें दिया है, उससे अन्य लोग भी लाभ उठा सकें और उनकी मुश्किलें कम हो सकें।
महाराज जी ने समझाया कि हम अपने आप को बहुत ऊँचा समझते हैं, और अपने ज्ञान, अपनी सांसारिक उपलब्धियों, अपनी धन-संपत्ति, और अपने शरीर पर बहुत गर्व करते हैं। लेकिन हम चाहे ख़ुद को कितना ही ऊपर क्यों न समझें, लेकिन जीवन के अंत में हम सबने मिट्टी में मिल जाना है। जब हम इस दुनिया से जायेंगे, तो हमारी कोई भी सांसारिक संपत्ति हमारे साथ नहीं जाएगी। हमारे अंदर असीमित दिव्य खज़ाने हैं, और हम उन्हें अवश्य पा सकते हैं अगर हम ध्यानाभ्यास के द्वारा अपने शरीर व मन को स्थिर कर लें।